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August 20, 2019
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भारतीय राजनीति में शब्दों के जाल का मायाजाल

Simna News

भारतीय राजनीति में नारों  का अधिक महत्व है। अगर यह कहा जाए कि राजनीति की शुरूआत से ही जनता पक्ष को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए राजनेताओं ने नारों को कारगार हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है, तो इसका जवाब हां भी हो सकता है और ना भी। बहुत से राजनीतिक दलों ने रचनात्मक नारों के आधार पर चुनाव जीते हैं जबकि नारों के लोगों को प्रभावित न कर पाने की सूरत में कई दल हार गए हैं। आज हम आपको इतिहास से लेकर वर्तमान के उन पन्नों से वाकिफ करवाएंगे जो यू तो साधारण प्रतीत होते है लेकिन शब्दों का यह तानाबाना कैसे भूतकाल से लेकर वर्तमान और भविष्य तय करता है, आप भी जानें।

 
इतिहास में प्रसिद्ध नारें –

 
“हिंदी-चीनी भाई-भाई” 
“जय जवान, जय किसान”
“गरीबी हटाओ”   
“इंदिरा भारत हैं और भारत इंदिरा है.” 
“सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी.” – अटल
“आम आदमी को क्या मिला?”

“मां, माटी, मानुष” 

अबकी बार मोदी सरकार

एक अच्छा नारा धर्म, क्षेत्र, जाति और भाषा के आधार पर बंटे हुए लोगों को साथ ला सकता है, शायद यहीं वजह है कि राजनीतिक दलों के नारे अक्सर देश का मिज़ाज भांपने की दल की क्षमता को रेखांकित करते हैं, लेकिन ख़राब नारा राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पलीता लगा सकता है। इस बात को साबित करने के लिए इतिहास में दो ऐसे उदाहरण है जो इस बात को प्रमाणित करते है कि नारों में मात्र शब्द जाल नहीं बल्कि वास्तविकता और सुनहरे कल का भी बोध होना चाहिए। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 1971 का चुनाव प्रचार में दिया गया नारा “गरीबी हटाओ” पूरे देश में गूंज गया और उसने कांग्रेस और इंदिरा गांधी को भारी विजय दिलवाई। क्योंकि तब भारत की अर्थव्यवस्था की हालत ख़स्ता थी और देश के गीरबों को इस नारे में उम्मीद की किरण दिखाई दी थी। वहीं इसके उलट चार साल बाद इंदिरा गांधी के आदेश पर आपातकाल लागू कर दिया गया जिसमें कई विपक्षी नेताओं को जेल भेज दिया गया और प्रेस की आज़ादी पर सख़्त प्रतिबंध लागू गिए गए। इसके जवाब में कई विपक्षी दलों ने एक जनता मोर्चा का गठन किया जिसने “इंदिरा हटाओ, देश बचाओ” और “संपूर्ण क्रांति” जैसे नारों के साथ प्रचार किया और उसे 1977 में एकतरफ़ा जीत मिली।
दिलों के तार छेड़ने वाला जादुई शब्द
हर साल की तरह इस साल सभी मुख्य राजनीतिक दलों को उम्मीद है कि उन्हें मतदाताओं के दिलों के तार छेड़ने वाला जादुई शब्द-समूह मिल गया है। 2014 के आम चुनावों में सर्वाधिक लोकप्रिय नारों की फेहरिस्त में  ‘अबकी बार मोदी सरकार’ का जादू रहा। बाद में इस नारे के इर्द-गिर्द कई अन्य मुद्दों को जोड़कर तत्कालीन यूपीए सरकार पर जमकर हमला बोला गया। जैसे- ‘बहुत हुई देश में महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’, ‘बहुत हुआ किसान पर अत्याचार, अबकी बार मोदी सरकार’, बहुत हुआ भ्रष्टाचार, अब की बार मोदी सरकार’ आदि। इस नारे को सोशल मीडिया ने हाथों हाथ लिया और ‘ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार, अबकी मोदी सरकार’, ‘अब आएगी जिंदगी में बहार, अबकी बार मोदी सरकार’ जैसे कई नारे गढ़ डाले।वहीं दूसरी तरफ मोदी नारों के वजह से विवादों में भी घिरे रहें। जिसमें- नमो-नमो और हर-हर मोदी, घर-घर मोदी भी शामिल है।
 गॉंधी परिवार के सपूत मैदान में है 
विपक्ष में बैठी खाक छान रहीं कांग्रेस नए जोश के साथ कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर मैदान में है, खास बात यह है कि इस बार 2019 में फिर से इतिहास दोहराने के लिए, गॉंधी परिवार के सपूत मैदान में है। यूपी कांग्रेस महासचिव का पदभार संभालते ही प्रियंका से संबंधित नारों से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रियंका की एंट्री कांंग्रेस के लिए संजीवनी साबित हो सकती है। राजनीतिक जानकार तो प्रियंका गांधी को इंदिरा गांधी का तकमा तक दें रहें है। नारों से सत्ता प्राप्त करने वाली इंदिरा गांधी की फेहरिस्त में नया नाम प्रियंका गांधी का शामिल हो सकता है। प्रियंका गांधी पर  लोकप्रिय हो रहे नारे में शामिल है “प्रियंका नहीं ये आंधी है दूसरी इंदिरा गांधी है” व “प्रियंका गांधी आई है नयी रोशनी लाई है”। 

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