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जानें क्या है जगन्नाथ यात्रा का महत्व, क्यों पलटा सुप्रीम कोर्ट का फैसला

Know what is the importance of Jagannath Yatra, why Supreme Court's decision reversed

कोरोना महामारी के बीच प्रशासन किसी भी तरह के प्रयोजन से किनारा कर रही है। भारी मात्रा में भीड़ के साथ होने वाले सभी आयोजन पर पाबंदी है। जिसको देखते हुए भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को लेकर भी कई सवाल खड़े हो रहे थे। लेकिन सैकड़ों याचिकाओं पर गौर करते हुए एवं धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने की अनुमति दे दी है। लेकिन इस रथयात्रा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वास्थ्य मुद्दों के साथ बिना समझौता किए और मंदिर समिति, राज्य और केंद्र सरकार के समन्वय के साथ रथ यात्रा आयोजित की जाएगी।

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बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 18 जून को हुई सुनवाई में पुरी में 23 जून को होने वाली रथयात्रा को कोरोना महामारी के कारण रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वास्थ्य मुद्दों के साथ बिना समझौता किए और मंदिर समिति, राज्य और केंद्र सरकार के समन्वय के साथ रथ यात्रा आयोजित की जाएगी। बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 18 जून को हुई सुनवाई में पुरी में 23 जून को होने वाली रथयात्रा को कोरोना महामारी के कारण रोक लगा दी थी।   लेकिन कोर्ट के फैसले को लेकर कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गई थी। जिसपर आज सुनवाई करते हुए कोर्ट ने रथयात्रा से एक दिन पहले अपने फैसले को पलटते हुए जगन्नाथ रथयात्रा को कुछ शर्तों के साथ निकालने की अनुमति दे दी है।

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रथयात्रा निकालकर भगवान जगन्नाथ को प्रसिद्ध गुंडिचा माता मंदिर पहुंचाया जाता हैं, जहां भगवान 7 दिनों तक आराम करते हैं। इस दौरान गुंडिचा माता मंदिर में खास तैयारी होती है और मंदिर की सफाई के लिये इंद्रद्युमन सरोवर से जल लाया जाता है। इसके बाद भगवान जगन्नाथ की वापसी की यात्रा शुरु होती है। इस यात्रा का सबसे बड़ा महत्व यही है कि यह पूरे भारत में एक पर्व की तरह निकाली जाती है।

जानिए क्या है जगन्नाथ रथयात्रा की महिमा

भगवान जगन्नाथ की मुख्य लीला भूमि ओडिशा की पुरी है। पुरी को पुरुषोत्तम पुरी भी कहा जाता है। राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं श्री जगन्नाथ जी हैं। यानी राधा-कृष्ण को मिलाकर उनका स्वरूप बना है और कृष्ण भी उनके एक अंश हैं। ओडिशा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ यानी कि लकड़ियों की अर्धनिर्मित मूर्तियां स्थापित हैं। इन मूर्तियों का निर्माण महाराजा इंद्रद्युम्न ने करवाया था।

भगवान की जगन्नाथ रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष की दि्तीया को जगन्नाथपुरी में आरंभ होती है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ साल में एक बार मंदिर से निकल कर जनसामान्य के बीच जाते हैं। इसलिए ही इस रथयात्रा का इतना ज्यादा महत्व है। रथयात्रा में सबसे आगे ताल ध्वज होता जिस पर श्री बलराम होते हैं, उसके पीछे पद्म ध्वज होता है जिस पर सुभद्रा और सुदर्शन चक्र होते हैं और सबसे अंत में गरूण ध्वज पर श्री जगन्नाथ जी होते हैं जो सबसे पीछे चलते हैं।

 

 

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