Educational History of India

योगी सरकार बनाम में बदलते नामों की सियासत

The politics of changing names in Yogi Sarkar Vs.

क्यों आज अपना घर भी पराया सा लगता है, 

एक डर का  दिलों -दिमाग पर साया सा लगता है,

क्या नाम बदल देने मात्र से हालात बदल जाएंगे,

क्या गरीबों को रोटी और बेरोज़गार को रोज़गार दिए जाएंगे, 

क्यों अब नाम पर भी सियासत हावी हो गई, 

क्या नाम बदलने मात्र से इलाहाबाद में हर मुसीबतों की रुसवाई हो गई,

क्यों इतिहास के नाम पर जातपात को हावी करते हो,

सब देख रहे है आप किस कदर वोट बनाने की तैयारी करते हो।      
इलाहबाद का नाम क्यों बदला गया   

जिलों, कस्बों, स्टेशनों, प्रतिष्ठानों के नाम बदलने का खेल बहुत पुराना है, इसमें कोई एक पार्टी शामिल नहीं है, पूरब-पश्चिम से लेकर उत्तर-दक्षिण तक हर राज्य में सरकारें अपने राजनीतिक नफा-नुकसान को देखते हुए शहरों के नाम बदलती रही हैं, मानो सियासत में नाम ही काफी है, राजनीतिक गलियारों की इसी विचारधारा को योगी सरकार ने एक बार फिर चर्चा के विषय बना दिया है, इस चर्चा की शरुआत योगी जी ने  मुग़लसराय स्टेशन का नाम बदलकर की थी, गौरतलब है कि आज हम जिस समाज में रहते वहां नाम ही सब कुछ है, नाम से लोगों का धर्म लोगों की जाती तक स्पष्ट हो जाती, इतिहास गवाह है कि भारत देश और इसकी राजनीति में नाम पर कई संग्राम हुए है कभी महज जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किसी की मौत का कारण बनी तो किसी व्यक्ति विशेष धार्मिक नाम को आए दिन आतंकवाद तक से जोड़ दिया जाता है, ये हमारे देश की मानसिकता ही है कि यहाँ सब कुछ नाम के बलबूते पर चलता और दौड़ता है शायद यहीं वजह है कि हमारे राजनेता इस नब्ज़ से भलीभांति पहचानते  है तभी तो सालों से प्रचलन का हिस्सा बन चुके नामों का परिवर्तन कर नामकरण करना देश की राजनीति का हिस्सा बन चुकी है ।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार 16 वीं सदी के पूर्व इलाहाबाद को प्रयाग व प्रयागराज के नाम से ही जाना जाता था लेकिन 1526 में यह पौराणिक भूमि मुगलों के अधीन हो गई, तब मुगल शासक अकबर ने इस ऐतिहासिक नगरी का नाम बदलकर अल्लाहाबाद कर दिया, अंग्रेजी में आज भी इसे अल्लाहाबाद ही कहा जाता है, लेकिन बोलचाल की भाषा में इसे इलाहाबाद कहा जाता था और यही नाम अब से पहले सरकारी अभिलेखों में दर्ज थे जबकि बताया जाता है कि प्रयाग का नाम पुराणों में दर्ज है, पुराणों व हिंदू धर्म की मान्यता अनुसार इस भूमि पर ब्रम्हा जी ने सृष्टि का सबसे पहला यज्ञ सम्पन्न किया था, यानी प्र से प्रथम और याग से यज्ञ शब्द मिलकर इस पावन भूमि का नाम प्रयाग पड़ा, इसे समस्त तीर्थों का राजा तीर्थराज, संगम, त्रिवेणी जैसे उपनामों से भी ख्याति प्राप्त है इसलिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी अादित्य नाथ  2019 में होने वाले महाकुंभ से पहले जनता को यह नाम समर्पित करना चाहते थे लेकिन राजनीतिक विचारकों को ने इसे धर्म  के नाम पर वोट की राजनीति करार दिया है, वहीं  सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने योगी सरकार पर तंज कसते हुए 18 और जिलों के नाम बदलने की सलाह दी है, फूलपुर लोकसभा सीट से सपा सांसद नागेन्द्र प्रताप सिंह पटेल ने इलाहाबाद शहर का नाम बदलकर प्रयाग राज किए जाने के फैसले के विरोध का ऐलान किया है।

इलाहबाद का नाम प्रयागराज रखने पर क्या हो रही है सियासत    

इलाहाबाद को प्रयागराज करने के साथ ही देश में नाम बदलने की राजनीति फिर से करवट लेने लगी है, इतिहास में यह  दर्ज है कि सोलहवीं सदी की चौथी दहाई में मुग़ल बादशाह अकबर ने इसे इलाहाबाद का नाम दिया, उसके बाद से लेकर आजतक यानी पिछले करीब 480 वर्षों से यह शहर इलाहाबाद के नाम से ही जाना-पहचाना जा रहा था लेकिन इस तरह अचानक सदियों से चले आ रहे नाम को बदलकर नवनिर्माण करना धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक पैतरा है, इसका गवाह भारतीय राजनीति को इतिहास भी है, “राजनीतिक दलों को नाम बदलने का फायदा मिलता रहा है, जब तक कांग्रेस का शासन था तब तक गांधी, नेहरू के नाम पर फायदा लिया गया, बसपा ने अपने आदर्श पुरुषों के नाम आगे बढ़ाए, बीजेपी भी यही कर रही है, नाम रखने एक खास वर्ग का झुकाव उस पार्टी और सरकार की ओर होता है,”  फिर भी आज विपक्ष इलाहाबाद का नाम बदलने पर सियासत कर रहीं है, नाम बदलने की प्रक्रिया नई नहीं है हर राजनीतिक पार्टी अपनी सुविधा अनुसार धर्म के नाम पर इतिहास से खेलती आई है।


नामों के नवनिर्माण में वर्तमान की बीजेपी सरकार बहुत ही बेहतर दांव खेल रही है जिसकी चुभन विपक्ष में बैठे उनके प्रतिद्वंदियों को हो रही है, इतिहास पर नज़र डाले तो बोम्बे का नाम बदलकर मुंबई, कलकत्ता से कोलकाता, गुड़गांव से गुरुग्राम, मद्रास का से चेन्नई और बैंगलोर से बंगलुरु होते देखा गया है, हाल ही में हरियाणा सरकार ने यमुनानगर जिले के मुस्तफाबाद का नाम बदलकर सरस्वती नगर रख दिया है, कहा जा रहा है कि यहां से सरस्वती नदी बहती थी, इससे पहले यहां साइबर सिटी गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्राम कर दिया गया था, दावा किया गया कि यह द्रोणाचार्य का शहर है, इसलिए गुरुग्राम नाम ज्यादा अच्छा होगा, इसके खिलाफ उद्योग जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी।

प्रयागराज मामले में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर तंज कसा था, अखिलेश के अनुसार शासक केवल ‘प्रयागराज’ नाम बदलकर अपना काम दिखाना चाहता हैं, जिसपर पलटवार कर श्रीकांत शर्मा ने कहा कि जनप्रतिनिधि और जनता की मांग पर नाम बदलता है, ये सरकार का कार्यक्षेत्र है और प्रयागराज का नाम बदलने से धर्म के साथ खिलवाड़ हुआ था, कांग्रेस द्वारा गुजरात के सीएम विजय रूपाणी के विरोध पर श्रीकांत शर्मा ने कहा कि कांग्रेस एक षड्यंत्र हैं जिनका स्वभाव दंगा और अराजकता फैलाना है। 

क्यों प्रसिद्द है इलाहाबाद और क्या है इतिहास  


इलाहाबाद उत्तर प्रदेश के प्रमुख धार्मिक नगरों में से एक था, जिसे प्राचीन समय में ‘प्रयाग’ नाम से जाना जाता था, अपनी सम्पन्नता, वैभव और धार्मिक गतिविधियों के लिए जाना जाता रहा है,  भारतीय इतिहास में इस नगर ने युगों के परिवर्तन देखे हैं, बदलते हुए इतिहास के उत्थान-पतन को देखा है, यह नगर राष्ट्र की सामाजिक व सांस्कृतिक गरिमा का गवाह रहा है तो राजनीतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र भी रहा, इलाहाबाद को ‘संगम नगरी’, ‘कुम्भ नगरी’ और ‘तीर्थराज’ भी कहा गया है, ‘प्रयागशताध्यायी’ के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्याइत्यादि सप्तपुरियाँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियाँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्ज़ा प्राप्त है।  

इलाहाबाल को नाम क्यों रखा गया प्रयागराज 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस नगर का प्राचीन नाम ‘प्रयाग’ है, यह माना जाता है कि चार वेदों की प्राप्ति के पश्चात् ब्रह्मा ने यहीं पर यज्ञ किया था, इसीलिए सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। प्रयाग अर्थात् ‘यज्ञ’, कालान्तर में मुग़ल बादशाह अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफ़ी प्रभावित हुआ, उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण ‘इलहवास’ किया अर्थात् “जहाँ पर अल्लाह का वास है”। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि ‘इला’ नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर थी, के वास के कारण इस जगह का नाम ‘इलावास’ पड़ा, कालान्तर में अंग्रेज़ों ने इसका उच्चारण इलाहाबाद कर दिया था, जिसे अब राज्य सरकार ने 444 साल बाद फिर से प्रयागराज कर दिया है   

क्यों प्रसिद्द इलाहाबाद  है 

उत्तरप्रदेश का सबसे बड़ा शहर इलाहाबाद कई मामलों में बेहद महत्वपूर्ण शहर है, यह न सिर्फ हिन्दुओं का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, बल्कि आज के भारत को बनाने में भी इसकी अहम भूमिका रही है, पहले प्रयाग के नाम से प्रसिद्ध इलाहाबाद का वर्णन वेदों के साथ-साथ रामायण और महाभारत में भी मिलता है, 1575 में मुगल बादशाह अकबर ने इस शहर का नाम इलाहाबास रखा था, जो बाद में इलाहाबाद के नाम से जाना जाने लगा, इलाहाबाद ने हर दौर में भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संपदा को सींचा है, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन, मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू और मुरली मनोहर जोशी जैसे कई विद्वान इलाहाबाद से ही निकले हैं, यहां के पर्यटन स्थलों में मंदिर, किला और विश्वविद्यालय शामिल हैं, तीर्थ का केन्द्र होने के कारण यहां कई प्रसिद्ध मंदिर भी हैं, वहीं अकबर के शासनकाल भी इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसे चाहकर भी बदला नहीं जा सकता, आज योगी सरकार धार्मिक महत्व को बताते हुए इलाहबाद का नाम बदलने का तर्क दो दे रहे है लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि इलाहबाद में हर प्रांत और मजहब की समान भागीदारी है ऐसे में इतिहास को बार-बार बदलना इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने का सामान है।  

योगी को नेम चेंजर क्यों कहा जा रहा है और क्या अब लखनऊ का नाम बदलेगी सरकार   


इलाहबाद से पहले भी योगी आदित्यनाथ सरकार की मांग पर रेलवे ने अगस्त में मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन कर दिया गया था, इसकी वजह यह बताई गई थी कि 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन के निकट चलती रेलगाड़ी में उपाध्याय की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी, अगस्त 2017 में ही केंद्र ने नाम बदलने पर संस्तुति दे दी थी, इन बदलावों के पीछे सियासी वजहें भी हैं, इलाहबाद का नाम बदलने के बाद इससे सम्बंधित हर नाम परिवर्तित किए जाएंगे,इसके अलावा मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखे जाने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र से बरेली, कानपुर और आगरा एयरपोर्ट का नाम भी बदलने का प्रस्ताव किया है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इलाहाबाद का नाम बदलने के प्रस्ताव को मंजूरी देने के साथ ही  जिन संस्थाओं के नाम में इलाहाबाद लगा हुआ है उनका नाम भी बदल दिया जाएगा,  इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद हाईकोर्ट व अन्य संस्थाओं को नाम को बदलने के लिए राज्य सरकार संबंधित संस्थाओं को पत्र लिखेगी, जाहिर अगर सरकार विकास से अधिक राज्यों और संस्थानों के नाम बदलने पर ध्यान केंद्रित करेगी तो स्वाभाविक रूप से योगी आदित्य नाथ को नेम चेंजर कहना भी स्वाभाविक ही है।

मुगलसराय जंक्शन के बाद लखनऊ और सभी उर्दू लफ़्ज़ों से सम्बंधित  सभी संस्थानों के नाम बदलने की राह पर है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, ज़ाहिर इस योगी जी की इस लम्बी फेहरिस्त में लखनऊ के बाद फैज़ाबाद भी शामिल है इसके साथ ही उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के नाम को भी लेकर बदलाव के परिवर्तन के स्वर तेज हो रहे है, आशंका है कि मोदी सरकार हर बार कि तरह इस बार भी नाम परिवर्तन को आस्था से जोड़ इतिहास की दुहाई देकर इस परवर्तन को धार्मिक चोला ओढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे, अब देखना दिलचस्प होगा कि धर्म की सियासत कर रहे योगी सरकार को आने वाले लोकसभा इलेक्शन में सत्ता की सेज मिलती है या विपक्ष में बैठने का सौभाग्य।

ये सच है कि देश की जनता बदलाव चाहती है लेकिन ये बदलाव राजनेताओं की रणनीति नै बल्कि देश की नीति और विकास के तहत होना चाहिए, हर जागरूक नागरिक का यहीं मत है कि ” बदलना ही है तो हमारे देश में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो बरसों से बदलने की राह देख रही हैं, यह वह हैं जिनका बदलना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, जैसे कि गरीबी को बदलना, बेरोज़गारी के हालात को बदलना, शिक्षा के घटते स्तर को बदलना, इलाहाबाद कुछ वर्ष और इलाहाबाद रहेगा तो कोई तूफ़ान नहीं आ जाएगा लेकिन गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा का यही हाल रहा तो हर अगला दिन पहले से ज्यादा अंधेरा लेकर आएगा।”  

गुलफशा अंसारी

Related posts

भारत के इतिहास में दर्ज पहला ऐतिहासिक युद्ध

admin

शक्तिशाली शासन और देश की दूसरी ऐतिहासिक लड़ाई

admin

क्या है धारा- 497, संशोधन की क्यों पड़ी जरुरत

admin

Leave a Comment

UA-148470943-1