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लॉकडाउन के बीच ऐसे मनाए बैसाखी, ਲੱਖ ਲੱਖ ਵਧਾਈਆਂ

This is how Baisakhi is celebrated amidst lockdown

13 अप्रैल के दिन को पूरे भारत वर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसकी एक अलग ही छटा देखने को मिलती है। ढोल नगाड़ों के साथ नाच गाकर इस दिन को जश्न  की तरह मनाया जाता है। इस त्योहार को बैसाखी के नाम से जाना जाता है।

तुस्सी हंसदे ओ सानू हंसान वास्‍ते
तुस्सी रोन्ने ओ सानूं रुआण वास्ते
इक वार रुस के ते विखाओ सोणेयो
मर जावांगे तुहाणूं मनान वास्ते
बैसाखी दा दिण है खुशियां मणान वास्ते

13 अप्रैल को मनाया जाने वाला यह त्योहार पंजाबी समुदाय में कृषि के नव वर्ष का प्रतीक भी है। हालांकि 13 अप्रैल का यह दिन भारतीय इतिहास में जलियां वाला बाग हत्याकांड के नाम से भी दर्ज है। इसलिए सबसे पहले इस दिन शहीद हुए लोगों की शहादत को याद कर श्रद्धांजलि भी दी जाती है और क्रूरतम दिन को भी याद किया जाता है।

ओह खेतां दी महक,
ओह झूमरां दा नचना,
बड़ा याद आउंदा है,
तेरे नाल मनाया होया हर साल याद औंदा है,
दिल करदा है तेरे कोल आके वैसाखी दा आनंद लै लां,
की करां लॉकडाउन दी मजबूरी,
फिर वी दोस्त तू मेरे दिल विच रेहंदा हैं!

13 अप्रैल का यह त्योहार खासकर पंजाब और हरियाणा के किसान अपनी पकी हुई फसल के कटने की खुशी में मनाते हैं। खास बात यह है कि बैशाखी का पर्व सिखों के 10वें गुरु गोविंद सिंह जी से भी जुड़ा हुआ है।  दरअसल, साल 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी के नेतृत्व में बैसाखी के ही दिन खालसा पंथ की स्‍थापना भी हुई थी। देश में फैले कोरोना वायरस की वजह से इस बार इस त्योहार की चमक फीकी जरूर पड़ गई है। आज कोई अपने सगे-संबंधियों से नाही मिल सकता है और न ही उस उल्लास के साथ यह त्योहार मना सकता है जैसा कि हर साल इसे मनाया जाता है।

ठंडी हवा का झौंका है,
पर तेरे बिना अधुरा है,
तुम लौट आओ हमनें खुशियों को रोका है,
बैसाखी की शुभकामनाएं।

 

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