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28/01/2020
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क्या है धारा- 497, संशोधन की क्यों पड़ी जरुरत

Why did section 497 need to be amended?
धारा 497 क्या है? 

धारा 497 भारतीय दंड संहिता की 158 साल पुरानी धारा है जिसके तहत अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी शादीशुदा महिला के साथ रजामंदी से संबंध बनाता है तो उस महिला का पति एडल्टरी के नाम पर इस पुरुष के खिलाफ केस दर्ज कर सकता है, इसमें ये भी प्रावधान है कि विवाहेतर संबंध में शामिल पुरुष के खिलाफ केवल उसकी साथी महिला का पति ही शिकायत दर्ज कर कार्रवाई करा सकता है, शिकायत दर्ज होने के बाद किसी पुरुष पर अवैध संबंध का आरोप साबित हो जाता है तो इसे अधिकतम सजा पांच साल की होती है, इस तरह के मामले की शिकायत किसी पुलिस स्टेशन में नही हो सकती बल्कि मजिस्ट्रेट के सामने की जाती है और सारे सबूत पेश करने होते है, सबूत पेश होने के बाद संबंधित व्यक्ति को समन भेजा जाता है, संशोधन से पहले आईपीसी की धारा 497 के तहत व्याभिचार में दोषी पाए गए पुरूष के खिलाफ कार्यवाही तो की जाती थी लेकिन एडल्टरी में लिप्त पत्नी के खिलाफ किसी भी तरह की कोई कार्रवाई नहीं कर सकता है, साथ ही इस मामले में शामिल पुरुष की पत्नी भी महिला के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं करवा सकती थी, धारा 497 केवल उस व्यक्ति के संबंध को अपराध मानती थी, जिसके किसी और की पत्नी के साथ संबंध हैं, पत्नी को न तो व्यभिचारी और न ही कानून में अपराध माना जाता था, जबकि आदमी को पांच साल तक जेल का सामना करना पड़ता है, यदि कोई पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है लेकिन उसके पति की सहमति नहीं लेता है तो उसे पांच साल की जेल होगी, लेकिन जब पति किसी दूसरी महिला के साथ संबंध बनाता है तो उसे अपने पत्नी की सहमति की कोई जरुरत नहीं  थी, जिसे 27/09/18 माननीय सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर  हम, तुम और वो को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया |

धारा 497 में संशोधन की ज़रूरत क्यों पड़ी ?

आईपीसी की धारा 497 में किसी विवाहित पुरुष के शादीशुदा महिला से उसके पति के मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाने को अपराध की श्रेणी में रख सजा का प्रावधान था, जबकि इसी मामले में व्याभिचार एवं अवैध संबंध स्थापित करने वाली महिला को भारतीय दंड संहिता से बाहर रखा गया था यानी अवैध संबंधों का खुलासा होने के बाद भी  महिलाओं को  न्यायिक रूप से किसी दंड का भागी नहीं माना जाता जबकि पुरूषों के लिए 5 साल तक की कैद का प्रावधान था,आईपीसी की इस धारा को भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए इसकी वैधता को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता शाइना जोसफ पीआईएल दाखिल की, जोसफ ने तर्क दिया कि यह कानून केवल पुरुषों को सजा देता जबकि सहमति से बनाए गए इस संबंध के अपराध में महिलाएं भी बराबर की भागीदार होती हैं, इस कानून के मुताबिक दोषी पुरुष को पांच साल तक की सजा हो सकती है, जबकि महिला पर उकसाने तक का मामला दर्ज नहीं हो सकता।

इस अपील पर कार्यवाही शुरू हुई और 8 अगस्त को हुई सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, 27/09/18 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि आईपीसी की धारा 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है, महिलाओं को हमेशा समान अधिकार मिलना चाहिए, महिला को समाज की इच्छा के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता, ‘पति कभी भी पत्नी का मालिक नहीं हो सकता है, जस्टिस एएम खानविलकर ने कहा कि ‘एडल्टरी किसी तरह का अपराध नहीं है, लेकिन अगर इस वजह से आपका पार्टनर खुदकुशी कर लेता है, तो फिर उसे खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला माना जा सकता है| 

महिला को पुरुष की जागीर समझने वाली प्रथा क्या खत्म हो पायेगी?

कोर्ट के आदेश को समाज का एक तबका महिला उत्थान की दिशा में इसे एक ऐतिहासिक फैसला मान रहे हैं, इससे न केवल स्त्री की आजादी, बल्कि उसकी यौन स्वतंत्रता भी संरक्षित होगी, शरीर स्त्री की निजी संपत्ति है, इस नाते उसे किससे संबंध बनाना है, इस फैसले का अधिकार स्त्री का है, स्त्री की यौन आजादी के अलावा उसके ‘पति-परमेश्वर’ की संपत्ति नहीं होने का जो वक्तव्य कोर्ट ने दिया है उससे समाज का एक अन्य तबका भारतीय संस्कृति और नैतिकता पर घोर अन्याय का उपाधी दे रहें है, जिससे भारत केवल विदेशी तौर-तरीकों की फोटोकॉपी बनकर रह जाएगा, गौरतलब है कि जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि ‘एडल्टरी कानून मनमाना है, यह महिला की सेक्सुअल च्वॉइस को रोकता है और इसलिए असंवैधानिक है, महिला को शादी के बाद सेक्सुअल चॉइस से वंचित नहीं किया जा सकता है|’ 

वहीं जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा कि कोई ऐसा कानून जो पत्नी को कमतर आंके, ऐसा भेदभाव संविधान की मूल भावना के खिलाफ है, एक महिला को समाज की मर्जी के मुताबिक सोचने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन क्या विवाह के बाद इस तरह के भोग की लालसा को कानूनी मान्यता देना और सालों से चली आ रही सेक्सुअल एडल्टरी को वैध करार देने से महिलाओं का सम्मान बढ़ाया जा सकता है, क्या इस तरह के कानून से समाज में व्याप्त पुरूष प्रधान पद का पतन संभव है!  

धारा 497 पर नया कानून आने से पहले क्या था पुराना कानून

भारतीय दंड संहिता की धारा 497 में विवाह के पश्चात विवाह सूत्र में बंधे पति-पत्नी के अलावा अन्य किसी  पुरुष या स्त्री से सम्बन्ध बनाना असंवैधानिक तथा असामाजिक माना जाता था, इस मामले दोषी महिला पर पति के बयान के आधार पर मामला दर्ज कर किया जाता है, व्यभिचारिता का दोषी पाए जाने पर दोषी के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही की जाती थी लेकिन इस मामले में महिला का  पति महिला के खिलाफ केस दर्ज करवाने में असमर्थ था, कुल मिलाकर विवाहित पुरुष के शादीशुदा महिला से उसके पति के मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाने को अपराध की श्रेणी में रख सजा का प्रावधान था, अवैध संबंधों का खुलासा होने के बाद भी  महिलाओं को  न्यायिक रूप से किसी दंड का भागी नहीं माना जाता जबकि पुरूषों के लिए 5 साल तक की कैद का प्रावधान था, जिसे 27 सितम्बर को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया,पांच सदस्यों की संविधान पीठ ने व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया, अदालत ने 150 साल पुराने कानून को महिला अधिकारों के खिलाफ बताते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया, कोर्ट ने कहा कि पत्नी का मालिक नहीं है पति| 

गौरतलब है कि धारा 497 केवल उस व्यक्ति के संबंध को अपराध मानती थी, जिसके किसी और की पत्नी के साथ संबंध हैं, पत्नी को न तो व्यभिचारी और न ही कानून में अपराध माना जाता था, जबकि आदमी को पांच साल तक जेल का सामना करना पड़ता है, यदि कोई पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है लेकिन उसके पति की सहमति नहीं लेता है तो उसे पांच साल की जेल होगी लेकिन जब पति किसी दूसरी महिला के साथ संबंध बनाता है तो उसे अपने पत्नी की सहमति की कोई जरुरत नहीं होती थी| 

कोर्ट में दायर अपील में इसके अलावा महिला के पति को ही शिकायत का हक होना कहीं न कहीं महिला को पति की संपत्ति जैसा दर्शाता है, क्योंकि पति के अलावा महिला का कोई अन्य रिश्तेदार इस मामले में शिकायतकर्ता नहीं हो सकते थे, लेकिन अब इस धारा को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा “व्यभिचार को तब तक अपराध नहीं मान सकते जबतक उसमें धारा 306 (खुदकुशी के लिए उकसाना) का अपराध न जुड़े|”

व्यभिचार का बदलता स्वरुप बदलते भारत का परिचायक

कई शताब्दियों तक भारतीय संस्कृति में चली आ रही जायज़ और नाजायज़ संबंधों की बिसात को सुप्रीम कोर्ट ने महिला उत्पीड़न और लिंग भेदभाव का परिचायक मानते हुए रद्द कर असंवैधानिक घोषित कर दिया, सुप्रीम कोर्ट ने 150 साल पुराने एडल्टरी पर आपराधिक कानून को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि यह बराबरी के हक (समानता के अधिकार)  के खिलाफ है, आईपीसी की धारा-497 महिला और पुरुष को समान नजर से नहीं देखने और आपराधिक कानून संवैधानिक रूप से पुरुष और महिलाओं के लिए बराबर किए जाने के तर्क देकर चुनौती दी गई थी, डेढ़ सौ साल पुराने एडल्ट्री कानून की कमियां सामने आने के बाद उसकी समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही थी, महिला-पुरुष समानता की दृष्टि से धारा 497 में यह बदलाव अहम माना जा रहा है, लेकिन इस फैसले के आधार पर महिलाओं के प्रति अपराध करना या काम आंकना किसी भी सूरत में उभरते भारत का परिचायक नहीं हो सकता लेकिन इस कानून  असंवैधानिक घोषित होने से बदलते भारत के कथन को मंजूरी दी जा सकती है, इस कानून के बाद एक और वैश्वीकरण ने आम से लेकर ख़ास के घर एक नए कानून के रूप में दस्तक दी है, जिसकी जड़ें भविष्य में भारत की संस्कृति को खोखली करने के लिए पर्याप्त है |     

इसमें  कोई दोराय नहीं है कि व्याभिचार के मुकदमे में पत्नी या महिला को आरोपी पक्ष नहीं बनाया जाता था और व्यभिचार की सजा सिर्फ पुरुष को मिल सकती है इसके अलावा महिला पति के मर्जी के बिना किसी अन्य पुरुष से सम्बन्ध स्थापित नहीं  कर सकती थी जबकि पुरुष  को इस मामले में महिला की रजामंदी की ज़रुरत नहीं थी, सुप्रीम कोर्ट ने समानता और नारी उत्पीड़न का हवाला देते हुए आईपीसी कीइस धारा को असंवैधानिक घोषित कर दिया जबकि सुप्रीम कोर्ट सर्वसम्मति से कानून में समानता भी स्थापित कर सकती थी लेकिन ” हम तुम और वो को संवैधानिक करार कर केवल आत्महत्या के लिए उकसाने के नाम पर हुआ अपराध ही इस कड़ी में जोड़ा जाना किसी भी तरह उभरते भारत ओर इशारा नहीं करता | 

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