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28/01/2020
Religious Sufism

सिर्फ धार्मिक ही नहीं सामाजिक महत्व भी बकरा ईद को बनाता है खास

Why Should we celebrate Bakra Eid

धर्म निरपेक्ष देश में हर त्यौहार बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। चाहे वह किसी भी धर्म से ही क्यों न जुड़ा हो। हर त्यौहार के साथ भारतवासी एक दूसरे से और अधिक प्रेम के साथ जुड़ जाते है। 12 अगस्त को देशभर में ईद-उल-अजहा यानी बकराईद मनाई जाएगी। यह पर्व मीठी ईद के ठीक 2 महीने 10 दिन बाद मनाया जाता है। इस पर्व की इस्लाम में बहुत बड़ी मान्यता है। इस दिन भी  पाकीजा स्वास्थ के साथ नमाज़ की अदायगी की जाती है।  नमाज़ की अदायगी के बाद कुर्बानी दी जाती है। जिसके लिए इस ईद को जाना जाता है। इस्लाम प्यार को बढ़ाने और अपने से दुर्बल लोगों की मदद के लिए जाना जाता है। ऐसे में कई लोग बकरा ईद पर जानवर की कुर्बानी की बात से असमंज में फंस पड़ जाते है। कुछ लोग इसे त्यागने तक की बात करते है। लेकिन इसमें कोई दोराए नहीं है कि दुनिया के सभी धर्म धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। चाहे वह कोई भी धर्म हो। हर त्यौहार को मनाने के पीछे न सिर्फ धार्मिक महत्व होता है।  बल्कि यह हमारे आज से भी जुड़ा होता है। बकराईद पर कुर्बानी हमें त्याग की भावना से प्रेरित करती है।  यह त्योहार आपसी भाईचारे को बढ़ाने का संदेश देता है। साथ ही लोगों को सच्चाई की राह में अपना सबकुछ कुर्बान कर देने की सीख देता है। 

धर्मानुसार बकरीद की मान्यता

इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, हजरत इब्राहिम खुदा के पैगंबर है।  हज़रत इब्राहिम सच्चाई के लिए लड़ते रहे। 90 साल की उम्र तक उनकी कोई औलाद नहीं हुई। लेकिन खुदा से मोहब्बत और उनपर उनका यकीन ही था कि 90 साल के बाद बेटा इस्माइल हुआ। बेटे इस्माइल से हज़रत इब्राहिम अलैही सलाम को बेइंतेहा मोहब्बत थी। दुनिया में सबसे अज़ीज उन्हें अपनी औलाद थी। एक रोज उन्हें सपने में खुदा का आदेश आया कि खुदा की राह में  कुर्बानी दो। उन्होंने कई जानवरों की कुर्बानी दी। लेकिन खुदा के फरमान और कुर्बानी के ख्वाब आने बंद नहीं हुए। एक रोज उनसे सपने में संदेश मिला कि तुम अपनी सबसे अज़ीज चीज़ की कुर्बान करो। उन्होनें गौर किया तो पाया कि इस दुनिया में उनके बेटे इस्माइल से अज़ीज और कुछ भी नहीं है। उन्होंने इसे खुदा का आदेश मानकर अपने बेटे इस्माइल को कुर्बान करने के लिए तैयार हो गए।

हजरत इब्राहिम को एहसास हो गया कि इस्माइल ही उनका सबसे अजीज है। इसलिए उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला कर लिया। उन्होनें दिल पर पत्थर रखकर अपने ख्वाब और खुदा के आदेश के बारे में अपने बेटे इस्माइल को बताया। बेटे ने भी खुदा के आदेश को सर्वोपरि बताते हुए खुदा के राह में कुर्बान होने की बात कहीं। इब्राहिम बार-बार कुर्बानी के लिए तैयार होते लेकिन ऐसा कर नहीं पाते। बेटे इस्माइल ने अपने अब्बू जान हज़रत इब्राहिम के दिल का हाल भांप लिया। इस पर उन्होनें कहा अब्बू जान आप अपनी आंख पर पट्टी बांध लीजिए। खुदा की मोहब्बत और उसके हुक्म को याद कर के छुरी चला दीजिए। हज़रत इब्राहिम ने ऐसा ही किया। कुर्बानी के वक्त हजरत इब्राहिम ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। अपने बेटे को कुर्बान करने के लिए आगे बढ़े और छुरा चला दिया। जब उन्होंने अपनी आंखों से पट्टी हटाई तो देखा कि उनका बेटा इस्माइल सामने जीवित खड़ा था और कुर्बानी वाली जगह पर दुम्बा पड़ा हुआ है।दरअसल जब हजरत इब्राहिम कुर्बानी के लिए बढ़े, तो खुदा ने उनकी निष्ठा को देखते हुए उनके बेटे की कुर्बानी को दुम्बे की कुर्बानी में परिवर्तित कर दिया। तब से ही बकराईद पर बकरे, मेमनों और हलाल जानवर की कुर्बानी दी जाने लगी।

समाजिक दृष्टिकोण और बकरा ईद 

एक गरीब परिवार जिसे दो वक्त की रोटी ही मुश्किल मुनासिब हो भला वह अपनी सेहत और खानपान के लिए क्या कर सकता है। जाहिर है कुछ नहीं,  सिर्फ पेट की भूख मिटाने योग्य बंदोबस्त हो जाए काफी है। निहायत ही गरीब परिवार शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्वों और उन्हें अपने खाने में शामिल करने का सोच भी नहीं सकते। ऐसे में बकराईद जैसा त्यौहार एक ऐसा त्यौहार है जो शरीर में उन पोषक तत्वों की पूर्ति करता है जिसकी शरीर को आवश्यकता है। बकराईद के दिन जानवर की कुर्बानी में आए मांस को तीन हिस्सों में बांटा जाता है जिसमें से एक हिस्से पर बेहद ही गरीब लोगों का हक है जो सालभर में एकाद दिन भी मुश्किल से पोषक तत्वों से भरपूर भोजन ग्रहण कर पाते है। इसके बाद दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों और दोस्तों में बांटा जाता है ताकि भाईचारे और सौहार्द की भावना को बढ़ाया जा सकें साथ ही तीसरा हिस्सा घर में आए मेहमानों और घर-परिवार के लिए होता है। आमतौर पर मटन का मीट किसी भी सामान्य परिवार की खरीद से बाहर है इसलिए बकराईद पर मटन सबसे ज्यादा प्रचलित है। यहाँ यह बात जानना जरूरी है कि कुर्बानी सभी पर फर्ज नहीं है यह केवल उनपर फर्ज है जो इस खर्च को उठा कर अन्य की भूख को शांत कर सबाब कमाना चाहते है। इस त्यौहार में खुद से ज्यादा समाज, दोस्तों के लिए किया जाता है।     

गुलफशा अंसारी

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